Friday, January 15, 2010

संगीत में तीव्र होता अपसंस्कृति का ‘पैशन’

लोकप्रिय संस्कृति और अपसंस्कृति पर बात करना जितना दिलचस्प है, फर्क निकालना उतना ही मुश्किल और पेचदार। वजह कि इसके लिए पूरी संस्कृति की पड़ताल करनी होगी। यह देखना होगा कि बदलाव के वे कौन-कौन से कारक हैं, जो समय के साथ बदले हैं, उनके प्रतिमान में अंतर आया है, मूल्यों में भिन्नता देखने को मिली है और सबसे ज्यादा तो यह कि एक सामाजिक प्राणी के तौर पर हमारे आचरण-व्यवहार में किस-किस तरह के परिवर्तनों का दख़ल बढ़ा है हैं? लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हैं, जो नहीं बदली हैं। इस संदर्भ में प्रख्यात साहित्यकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है, ‘संस्कृतियाँ जब बदलती हैं, तब खान-पान, रहन-सहन, पोशाक और परिच्छेद भले ही बदल जाए, किंतु उनका मन नहीं बदलता है, उनकी सोच की पद्धति नहीं बदलती और उनका जीवन को देखने वाला दृष्टिकोण भी एक ही रहता है।’
सीधे-सीधे बदलाव को आत्मसात और बदलाव का बाॅयकाट करने से ज्यादा अहम सवाल यह है कि समय के साथ समाज के रहन-सहन, खान-पान, पहनावे-ओढ़ावे, भाषा, गीत-संगीत इत्यादि में बदलाव होते रहे हैं या नहीं? ऐसे बदलावों पर किस हद तक दोषारोपण सही है? यह जानते हुए कि एक बड़ा तबका इस बदलाव का आकांक्षी है। उसे अपनी उन्मुक्त सत्ता से लगाव है। वह चाहता है कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर उन तमाम चीजों का अनुकरण करे, जो उसके लिए ज्यादा मुफीद मालूम पड़ती हो। आप नैतिक आग्रह और जीवन के आदर्श-मूल्यों के अधार पर उसे नकार नहीं सकते। यह लोकप्रिय संस्कृति की पहली शर्त है।
यहाँ हम कार्ल यंग के मुताबिक संस्कृति को परिभाषित करना चाहे, तो ‘‘संस्कृति सामूहिक बेहोशी है, जो शताब्दियों के दौरान होती है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को उत्तराधिकार के रूप में सौंप दी जाती है। संस्कृति हमें बताती है कि लोगों का एक समूह किस तरह सोचता है और उसका व्यवहार कैसा है?’’
बिल्कुल सटीक शब्दों में कहें, तो लोकप्रिय संस्कृति ऐसे ही एक समूह की विरासत है, जो अपनी अगली पीढ़ी को अपसंस्कृति की नीम-बेहोशी में डूबो देने को उतारू है। लोकप्रियता का अर्थ ज्यादा से ज्यादा लोगों का किसी खाश तरह के सोच, आदत, व्यवहार, कला या चिंतन में हिस्सा लेने के लिए उकसाना है। उदाहरण के लिए आधुनिक कला-माध्यम के अंग के रूप में सिनेमा का जन्म भारतीय नाट्य परंपरा या पारसी थियेटर से हुआ। लेकिन तकनीकी प्रभाव द्वारा आज यह संचार-माध्यमों का एक सशक्त पहलू है। इसी प्रकार शास्त्रीय-गायन और नृत्य से आर्केस्ट्रा जैसे लोकप्रिय माध्यम का जन्म हुआ है।
लोकप्रियता में हमेशा सबकुछ गलत या अनैतिक हो, यह जरूरी नहीं। आज अगर लता-रफी और किशोर के गीत मशहूर और लोगों के लिए बेहद कर्णप्रिय है, तो इसकी मुख्य वजह तेजी से बदलते मानदंडो के बीच भी पारंपरिकता से जुड़े रहने की जिद कही जाएगी। लेकिन ऐसा कम ही होता है। आज फिल्म-संगीत की दुनिया में जिस तरह से बेशुमार दौलत की आमद बढ़ी है। लोग बाजारवाद के उपभोक्तावादी प्रवृति के चपेट में आये हैं। फिल्मी गीत-संगीत ने भारतीय पारंपरिकता को तज एक नया रास्ता अख्तियार कर लिया है। आधुनिकता के नाम पर नए किस्म के गीत-संगीत का चलन बढ़ा है। लोग स्वर की मिठास और धुनों के मनोहर संगत की बजाय इस बात से ज्यादा प्रभावित होने लगे हैं कि कौन-से गाने पर सबसे ज्यादा शोर एवं हो-हल्ला मचेगा? आज गीत-संगीत में उलजलूल शब्दों और ध्वनियों का प्रयोग बढ़ा है। पश्चिमी वाद्ययंत्रों ने पाॅप और राॅक किस्म की जो संस्कृति गढ़ी है, उसमें अनावश्यक शोर, दोअर्थी भाव तथा अश्लील शारीरिक संप्रेषण ज्यादा घुलामिला है।
हम इस बात को अस्विकार नहीं कर सकते हैं कि भारतीय मिज़ाज में लोकप्रिय कलाओं का तेजी से आगमन हुआ है-चाहे कंटेंप्रेरी म्यूजिक हो, इंडीपाॅप म्यूजिक हो या बाॅलीवुड का असर। इन बदलावों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमारे समय की संस्कृति संक्रमण काल से गुजर रही है। कई चीजें सामने आ रही है-लोकप्रिय संस्कृति का उठान, उच्च संस्कृति का फैलाव, आधारभूत सुविधाओं की कमी का अहसास इत्यादि। लाख बचने के बावजूद हमें यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि भूमंडलीकरण की वजह से देश की संस्कृति पर विदेशी संस्कृति के हमले तेज हो गए हैं। सूचना क्रांति, ‘बुद्धू बक्सा’ कहे जाने वाले टेलीविजन और सिनेमा के जरिए संस्कृति के नाम पर फैलायी जा रही अपसंस्कृति ने नैतिकता, सदाचार, सयंम, अनुशासन, सद्भाव और संतोष जैसे भारतीय संस्कृति के पुरातन मूल्यों को कमजोर किया है। समाज में विषमता बढ़ रही है। लोगों का रूझान चलताऊ और बाजारू किस्म के लोकाचार पर निर्भर हो गया है। आज गीत-संगीत में शास्त्रीय संगीत की तरह शांति और नीरवता के बीच फैली सुकून का रस नहीं है बल्कि क्षणिक हंगामा का एक ऐसा कोलाहल भरा समूह है, जो गीत-संगीत के नाम पर केवल ‘झूमो जम के झूमो...,’ का कर्कश राग अलापता है।
अपने देश की भाषा से गहरा जुड़ाँव महसूस करने वाले प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहें, तो ‘हमारे संस्कृति की खासियत है उसकी भाषिक बहुलता, जो भारतीय संस्कृति को एक ऐसा व्यापक धरातल प्रदान करती है जो शायद विश्व के किसी अन्य देश के पास नहीं है।’ लेकिन अफसोस अब भाषा से लोगों का लगाव नहीं रहा। आज शादी-विवाह के मौके पर डीजे लग जाते हैं। इतना शोर कि बगल में बैठे आदमी की आवाज न सुनाई दे। गानों के बोल और उस पर होते बेमतलब का नृत्य कई मरतबा मजा किरकिरा कर डालते हैं। जरा गौर कीजिएगा, लिखा तो हमारे सज्जन गीतकार गुलजार ने है, लेकिन इसे जिस बेहयाई(माफ करेंगे) के साथ परदे पर फिल्माया गया है, वह बेहद खतरनाक है, ‘ न गिलाफ न लिहाफ, ठंडी हवा भी खिलाफ...ससूरी..., ओ इक सर्दी है कि किसी का लिहाफ लेई ले,,,जा पड़ोसी के चूल्हे से आग लेई ले।’
कवयित्री पद्मा सचदेव इस माहौल से, जो लोकप्रियता के नाम पर अपसंस्कृति फैलाने का दुश्चक्र रच रही हैं, लगभग नाराजगी भरे लहजे में कहती हैं, ‘पहले के गानों में क्या कशिश होती थी, जय देव का वह गीत, ‘तू सच बता जोगी, सजन से बात कब होगी’ का जिक्र करें या ‘रमैया वस्ता वैया’ या फिर ‘तीर खाते जा रहे हैं, आँसू बहते जा रहे हैं’ आज भी सुनने के बाद एक अलग किस्म की झुरझुरी बदन में फैला देते हैं, जो आज के सतही गानों और अनर्गल के धूम-धड़ाम से हरगिज संभव नहीं है।’
सचमुच एक जमाने में सूफी गानों, गजलों, कव्वालियों, लोकगीतों तथा हमारे खास उत्सव-त्योहार में गाये जाने वाले मुखड़ों का बोलबाला था। उस जमाने में मुंबइया फिल्म संगीत धुनें और भाषा उधार लेता था। अब बिल्कुल उल्टा होने लगा है। फिल्मी धुनों ने लोक-संगीत और परंपरा को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सिनेमाई हिन्दी में हिन्दुस्तानी हिन्दी का वो रूआब नहीं रहा, जो पहले के फिल्मों में हुआ करती थी। लोकप्रियता बटोरने की सनक ने इसमें इतना गड़बड़झाला कर दिया है कि अब पुराने वक़्त के गाने भी नये रीमिक्स संस्करण में बेकार मालूम देते हैं। बतौर उदाहरण हम गौर फरमा सकते हैं, ‘ले के पहला-पहला प्यार, भर के आँखों में खुमार...जादूनगरी से आया है कोई जादूगर...,’, ‘काँटा लगा....,’ या कि ‘टन....टना....,’ ।
संगीत की दुनिया में संगीतकार पं0 रविशंकर, टीके जयराम अय्यर, गुलाम अली, उस्ताद विलायत हुसैन खाँ, उस्ताद अल्लारखा खाँ, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज, बेगम अख्तर, गुलाम मुस्तफा खाँ, परवीन सुल्ताना और ध्रुव घोष के नाम मशहूर हैं। इसी तरह गीत के क्षेत्र में ‘माइल स्टोन’ माने जाने वाले कुंदनलाल शहगल, रफी, लता, किशोर, मन्ना डे, तलक महमूद, सुरैया, नूरजहाँ, आशा भांेसले, कविता कृष्णमूर्ति, अलका याज्ञनिक, उदित नारायण और सोनू निगम की लंबी फेहरिस्त है। ऐसा नहीं कि फिल्मी गीत-संगीत का माहौल बिल्कुल गंदा है, कुछ उभरते गीतकार और संगीतकार जैसे प्रसून जोशी और रहमान ने सांस्कृतिक विरासत को अभी भी बेजोड़ पकड़ के साथ थामे रखा है। लेकिन लोकप्रिय संस्कृति से अपसंस्कृति में हो रही तब्दीली के बरक्स यह काफी कम है।
वस्तुतः किसी जमाने में अंताक्षरी ‘रियलिटी शो’ के फ्रेम में दिखाया जाता था। यह परंपरागत अंताक्षरी के खेल को स्वस्थ तथा मनोरजंक ढंग से छोटे परदे पर दिखाने की पहल थी। लेकिन जब बाजार में मनोरंजन को भी बेचा जाने लगा तो यही अंताक्षरी ‘रियलिटी-शो’ बन गई। ‘सारेगामा’, ‘इंडियन आयउल’ तथा ‘वाॅयस आॅफ इंडिया’ में जिस तरह के फुहड़पन दिखलाये जा रहे हैं, वो लोकप्रियता के नाम पर सांस्कृतिक गंदगी उछालने के अलावा कुछ नहीं है। यह कहीं न कहीं राजनीति या कूटनीति का शिकार है। हमेशा विवादों की चक्करघिन्नी से घिरा रहने वाला ‘रियलिटी शो’ गीत-संगीत में नए टैलेंट को उभारने के बजाय बाजारवादी अतिवाद का नमूना है।
ताज्जुब है कि कल तक जिस संगीत की दुनिया में लता बहनों की तूती बोलती थी। आज वो भी इस बाजारवाद से अछूती नहीं है। उनके अलावा सुनिधी चैहान, श्रेया घोसाल से लगाकर वीवा बैंड और आस्मां जैसे बैंड भी है, जो लोकप्रियता का आसमान छूने को खुद बेताब है। स्वयं को ‘प्रमोट’ और ‘हाईलाइट’ करने की जो छद्म मोहरे खिसकायी जा रही है, उसमें गीत-संगीत के बादशाह भी शामिल हैं। ‘कजरारे....कजरारे...’ पर अपने कुल्हे चमकाने को बेसब्र ऐश्वर्या अपने प्रभाव से ‘एंग्री यंगमैन’ अमिताभ बच्चन को भी अपने आगे-पीछे कमर हिलाने और जबरिया चेहरे पर आशिकाना भाव(एक्सप्रेशन) लाने को विवश कर रही हैं।
अब तो गीत-संगीत के नाम पर ‘बाॅडी एक्सपोज’ अर्थात लटके-झटके दिखलाने की जो वाहियात परंपरा शुरू हुई है, उसका उदाहरण फिल्म मस्ती के इस गाने से दे सकते हैं-‘चोरी-चोरी छोरा-छोरी, छत पर मिलेंगे...तो खेलेंगे प्रेम गेम, आॅन द रुफ, इन द रेन।’ इसी तरह फिल्म ‘कंपनी’ का एक आइटम सांग बोल के साथ-साथ अपने बदन की नुमाइष के लिए भी लोकप्रिय है-‘बच के तू रहना रे...बच के तू रहना, नहीं दूजा मौका मिलेगा संभलना, कहीं भी छुपा हो, तूझे कर ही देगा...है कमबख़्त इश्क...ख़ल्लास’
भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पूणे के पंकज राग आज के गीत-संगीत में प्रयोग के नाम पर किये जा रहे फुहड़पन पर सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि ‘‘भूमंडलीकरण के असर के कारण गीत-संगीत के मामले में नकल की प्रवृति इतनी बढ़ गई है कि अगर एक संगीतकार ने 40 गाने बनाए हैं, तो निश्चित रूप से 35 गाने नकल पर आधारित होंगे। पहले के लोग भी नकल करते थे, ओनी नैयर, आरडी बर्मन जैसे संगीतकारों ने भी पश्चिम की धुनों की छाया के आधार पर संगीत की रचना की, लेकिन आज के संगीतकारों की तरह नकल को ही असल बनाकर नहीं।’’
ऐसा नहीं कि चंद बुरे गाने पूरे संस्कृति को दूषित कर सकते हैं। लोकप्रियता के ये चूरन हमारी उस विरासत की चूलें हिला सकती हैं, जिसमें संगीत की एक लंबी परंपरा और धारा रही है। लेकिन समय का रूख जिस भयावह तरीके से करवट ले रहा है। मान्यताएँ खारिज हो रही हैं। पूँजी और बाजार का वर्चस्व मनुष्य के वैचारिकी पर हमला बोल रहे हैं। उस नजरिए से देखें, तो गीत-संगीत में फुहड़पन की एक नयी राग(टेक) विकसित हुई है। संस्कृति के पुराने मापदंड और विचारधारायें जिसमें मानवीयता के अतिरिक्त देश, काल और परिवेश की सामाजिकता भी महत्वपूर्ण थी। आज उनका तेजी से विध्वंस या सत्यानाश हुआ है।
बेशक! नई पीढ़ी तेज-तर्रार और अपने समय से आगे बढ़ कर सोचने वाली है। वह तकनीक और जानकारी से लैश है। वह समाज के अंदर चल रहे तमाम गतिविधियों से वाक़िफ़ है। वह हर तरह की छूट चाहती है। उसके अंदर रूढ़ियों से बाहर निकलने की बेचैनी है। लेकिन इस मिली आजादी के बाद वह अपना कदम किस ओर बढ़ाए, बस यह विवेक उसके पास नहीं है।

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