Friday, January 15, 2010

सफर में पेट का साथी है ‘डब्बावाला’

चैबीसों घंटे रफ़्तार में रहने वाला शहर है मुंबई. यहाँ कि जीवनशैली में व्यस्तता अधिक और आदमी बेफुरसत ज्यादा है. चाय-नाश्ते पर गुजर जाता है दिन. टल जाता है खाने का वक्त. मनमसोस कर फास्टफुड या रेडिमेड आइटम से पेटपूजा करनी पड़ती है. अगर एक दिन की बात हो, तो कोई फिक्र नहीं. लेकिन अगर ऐसे ही रोज-रोज चले, तो फिर जिंदगी का मजा किरकिरा होना स्वाभाविक है. यहाँ एक मददगार साथी साबित होता है-डब्बावाला. वह घरेलू सदस्य नहीं है, लेकिन उसे आपके खाने का सही और पक्का समय याद है. भूल-चूक की जरा भी गुंजाइश नहीं. बस आप घर का पका-पकाया खाना बंद लंच-बाॅक्स में पैक कर डब्बावाले को थमा दो, वह बिना किसी तामझाम और झिकझिक के उन तक हाजिर कर देगा, जिन तक आप भेजना चाहते हैं. अब चाहे दफ्तर हो या शो-रूम, प्लांट हो या कोई भी संस्थानिक प्लेटफार्म. आप हर जगह चख सकते हैं घर में बने खाने का स्वाद. क्योंकि इस स्वाद में डब्बावाला के भरोसे का स्वाद भी घुला होता है. अगर याद हो, तो स्मरण कीजिए. प्रिंस चाल्र्स ने वर्ष 2003 में भारत दौरे के दौरान मुंबई के डब्बावालों से मिलने की शुभेच्छा जाहिर की थी, तो यह अनायास नहीं था. दरअसल, ‘डब्बावाला’ अपनी लोकप्रियता का अहसास विगत 125 वर्षो से निरंतर करा रहा है. यह एक संगठित टीम है, जो अपने काम के प्रति सदैव प्रतिबद्ध दिखता है. आतंकी हरकते भी इनके मंसूबे को डिगा नहीं पाती. बता दें कि मुंबइ्र्र के अतिव्यस्तम शहरी इलाकों के बीच फैला यह ‘डब्बावाला तंत्र’ आम-आदमी के भरोसे का साथी है, जिसका मददगार हाथ कामकाजी लोगों के साथ मजबूत रिश्ता जोड़े हुए है. ब्रिटिश राज में स्थापित डब्बावाला सिस्टम उन कामकाजी अंगे्रजों की सहूलियत के लिए बनाया गया था, जो दफ्तरी काम के चक्कर में खाने-पीने का सुध न रख पाते थें. इसका हल उन्होंने कुछ जरूरतमंद भारतीयों का समूह गठित कर किया, जो मासिक भुगतान की निश्चित रकम पर ‘होममेड लंच बाॅक्स’ डिलिवरी का काम करने को इच्छुक थें. छोटे पैमाने पर हुई अतीत की यह शुरुआत आज मुंबई के लाखों लोगों के अटूट बंधन और विष्वास का प्रतीक बन गया है. 1980 के आस-पास शुरु हुआ डब्बावाला सिस्टम आज मुंबई में ‘अन्नदाता’ के उपनाम से भी फेमस है. खाकी कपड़े की उजली टोपी और धोती डब्बावाला का सिग्नेचर ड्रेस कोड है. प्रतिदिन 2 लाख घरों से डब्बावाला संपर्क साधता है और बिना एक फीसदी हेर-फेर या गड़बड़ी का वह 3 घंटे के भीतर अमुक डब्बा निर्देशित स्थान पर पहुंचा देता है. इस काम में 5 हजार डब्बावालोें की सीधी भागीदारी है. आप सोच रहे होंगे कि इतने बड़े पैमाने पर यह काम संचालित कैसे होता है, तो जान लीजिए. सर्वप्रथम डब्बावाला अपने ‘कस्टमर होम’ से डब्बा इक्ट्ठा कर नजदीकी रेलवे स्टेषन तक पहुंचाने का काम करता है. दूसरा डब्बावाला उसे लैगेज कैरियर में साजता है. तीसरा शख्स उसे लेकर आगे को बढ़ जाता है. इस तरह करीब 60-70 किलोमीटर की दूरी तय करने में डब्बा 6 से अधिक मर्तबा अदला-बदली होता है. तब जाकर वह अंतिम गंतव्य के पास पहुंचता है. किसी भूल या त्रुटि की कोई गुंजाइष शेष न रहे. इसके लिए डब्बावाले ‘कलर कोडिंग’ पद्धति अपनाते हैं. यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि कार्यरत डब्बावालों में से 85 प्रतिशत अशिक्षित और बाकी महज 8वीं पास हैं. 5 हजार डब्बावाले मिलकर 2 लाख लोगों तक रोजाना डब्बा पहुंचाने का काम करते हैं. अनुमानतः 65 करोड़ डब्बा प्रतिवर्ष बिना किसी मिस्टेक का डिलिवर्ड होता है. दुरुस्त प्रणाली के इस सफल तंत्र का गहन मुआयना कर अमेरिका के ‘फोब्र्स’ मैग्जीन ने सन 1998 में डब्बावालों को ‘सिक्स सिग्मा परफार्मेंस रेटिंग’ प्रदान किया है. यह 6 करोड़ डिलिवरी की शुद्धता पर आधारित था, जिसमें 99.99 प्रतिषत एक्यूरिसी मौजूद थी. लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डब्बावालों पर आधारित पुस्तक ‘मुंबईया अन्नदाता’ को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया था, जिस किताब को शोभा वोद्रि ने लिखा है. एक और किताब ‘डब्बावाला’ नाम से आई है, जिसे श्रीनिवास पंडित ने लिखा है. वास्तव में डब्बावालों की चरम लोकप्रियता का आलम यह है कि यहाँ की सभी आईआईटी तथा अधिकाषतः आईआईएम में उन्होंने गेस्ट लेक्चर दिया है. आरबीआई, आईएसबी, माइक्रोसाॅफ्ट तथा महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा ने भी अपने संस्थान में अतिथि भाषण के लिए आमंत्रित किया था. वर्तमान में डब्बावाला ‘नुतन मुंबई टिफिन बाॅक्स सप्लायर एसोसिएशन’ के नाम से रजिस्टर्ड है. लेकिन मशहूर यह ‘मुबंई डब्बावाला एसोसिएषन’ के नाम से ही है. मौजूदा समय इस संस्था का अध्यक्ष रघुनाथ धोनडिबा मेडगे हैं, जो इस विशाल समूह की देखरेख, संचालन और किसी भी किस्म का डब्बावालों से संबंधित समस्या का निपटारा करते हैं. प्रबंधन की सख्त हिदायत है कि दोपहर के 1 बजे तक डब्बा हर हाल में डिलिवरी हो जाने चाहिए तथा उल्टी समय 3 बजे के बाद खाली डब्बा वापिस मूल स्थान तक पहुंचाने का काम शुरु कर देना चाहिए. शराब पी कर सर्विस देने पर रोक है. ऐसा करने पर बतौर जुर्माना 1000 रुपए जमा करना होगा. यही नहीं खाकी उजली टोपी सर पर न होने की स्थिति मेे 25 रुपए के दंड का प्रावधान है. इस तरह ईमानदारी, सेवाभाव तथा मिलनसार स्वाभाव हर डब्बावालों का स्टेट्स सिंबल है. काम के प्रति जिम्मेदारी तथा कस्टमरों के साथ अपनापन का व्यावहार भी जरुरी है. इस जानकारी के आधार पर आप खुद निर्णय करें.....हम विद्यार्थियों के नजरिए में इस डब्बावाला का ओहदा क्या है और कितना महत्वपूर्ण है?

No comments: