Friday, January 15, 2010

रहना नहीं रमना कहिए बनारस में

भारत की सांस्कृतिक राजधानी बनारस अन्य शहरों से कई मायने में जुदा है. यहाँ पारंपरिकता से जुड़ाव है, तो आधुनिकता का रंगरोगन भी. धर्म और आस्था का पुरातनपंथी दिनचर्या है, तो कला, साहित्य और वैचारिक बहस-मुबाहिसे भी. यहाँ लोकसेवा के निमित बने अनेकों धर्मशाला हैं, तो पाँच-सितारा होटल और महँगे रेस्तराँ भी. एक तरफ पारंपरिक बुनकरों द्वारा बनाये कपड़ों का बाजार है, तो दूसरी तरफ माॅल-कल्चर की तर्ज पर निर्मित गगनचुंबी मल्टीप्लेक्स. गंगा किनारे बने घाटों की संख्या तकरीबन सौ से ज्यादा हैं. जिसके इर्द-गिर्द हमेशा श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है. फूल-माला लिए धमाचैकड़ी करते छोटे उम्र के बच्चे भी घाटों के समीप आकर्षण का मुख्य केन्द्र होते हैं, जो बालसुलभ तरीके से पूजन-सामग्री लेने के लिए निवेदन करते मिल जाएंगे. दुनियावी तामझाम से बेफिक्र यह रहस्यपूर्ण जीवन परदेशी मानवों के अंदर चरम कुतूहल का संचार करता है. दिलचस्प शहर है बनारस, जहाँ सलाना 5 लाख के करीब सैलानी आते हैं। उनकी यह आवाजाही इस शहर की जीवंतता का सबूत है, जो यहाँ आकर यही का हो जाना चाहते है। गंगा-जमुनी तहजीब, जो मानव के सहअस्तित्व का प्रमुख लक्षण है, बनारसवासियों में गहरे पैठी है. लिहाजा, छद्म मजहबी उन्मादों, सांप्रदायिक कुचक्रों तथा पारस्परिक सौहार्द बिगाड़ने वाले राजनीतिक हथकंडों को प्रशय का मौका ही नहीं मिलता.
किस्म-किस्म के नामों, उपनामों और मिथकीय उपाधियों से नवाजा जाता है बनारस. कोई इसे गलियों का शहर कह आनन्दित होता है, तो किसी को घाटों का जीवन इतना लुभाता है कि वह इसे घाटों का शहर समझने लगता है. बनारसी साड़ियाँ, जो कभी भारतीय नारियों की पसंदीदा परिधान थी. आज प्रायोजित माॅडल और फैशन के युग में हाशिए पर हंै, किंतु साँस टूटी नहीं. आज भी बनारसी साड़ियों की मांग वैवाहिक अवसरों पर सर्वाधिक है. उसी तरह फास्टफूड और कोल्डड्रिंक के इस जमाने में भी अगर लोग मिट्टी के कुल्हड़ पसंद करते हैं, तो इसके पीछे बनारसीपन जुड़ाव पहली वजह है. इसी तरह शौकीन लोग पान का बीड़ा चबाते हुए देश-विदेश के हाल-हालात पर चर्चा करते हैं, कला, साहित्य और लोक-चेतना के बाबत बहस करते हैं. ताज्जुब है कि इस शहर में जेट-वायुयान के युग में भी ‘एक्का’ अर्थात घोड़ागाड़ी प्रचलन में है. ठंडई, लस्सी, कचैड़ी, जलेबी और इमरती के दूकानों पर उमड़ती रेलमपेल भीड़ रोजाना का टंट-घंट है. यही नहीं धर्म, शास्त्र, वास्तु, कला-साहित्य, संगीत, नाटक, रामलीला, लोकगीत व गायन सभी क्षेत्रों में अग्रणी है बनारस. जहाँ आ कर पर्यटक खुद ही अपना सुध-बुध खो देते हैं. दर्षनार्थी मंत्रमुग्ध हो इसके चप्पे-चप्पे का खाक छानते हैं. आगंतुक घाटों के किनारे बने प्राचीन इमारतों, किलानुमा मेहराबों तथा नक्काशीदार भवनों के बीच से पावन नदी गंगा को अपलक निहारते हैं. किसी एक मुंडेर या झरोखे से सुबह-ए-बनारस का नजारा देखते हैं. सांध्य आरती, जो बनारस का पहचान-प्रतीक है को देखने हेतु जबरिया नावों की सवारी करते हैं. निःसंदेह कण-कण में थिरकन का अहसास कराते इस शहर में उमंग, उत्सव और उल्लास का जलवा जिस बुलंदी पर है. उसे देखकर ईष्र्या स्वाभाविक है. यँू तो इस उम्रदराज शहर में समय के साथ पैदा हुई समस्याएँ भी ढेरों हैं. लेकिन वह इन सभी से अपने हिसाब से निपटता है.
(जारी)

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