Thursday, January 21, 2010

युवा नेता अपराधवीर जी का जनता को उद्बबोधन

प्रिय भाइयों,
आपके जुझारुपन के हम कायल हैं। आपके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली महिलाओं के बुलंद हौसले पर फिदा हैं। आपकी बिरादरी में शामिल युवा साथियों का हम विशेष रूप से शुक्रगुजार हैं, जो हर मौके पर हमारे साथ कमरकस कर डटे हैं। हम ने जिंदगी में दौलत खूब कमाये। ऐश-मौज भी खूब किए। अपने खिलाफ एक लफ़्ज बर्दाश्त नहीं किया। पंगा लेने वालों को सरेआम नंगा कर मौत की नींद सुला दिया।
कबूल करता हँू, मैंने नासमझी की। उम्र के जोश में जो हरकत की, उसके लिए लज्जित हँू। क्षमाप्रार्थी हँू आप-सबका कि आपके घर की बहू-बेटियों पर बुरी नज़र डाला। फिर भी आपने इसी जल्लाद को अपने घर का असली सपूत माना। हथेली पर सत्ता का ताज रखा। अपने क्षेत्र का 40 वर्ष के उम्र में युवा मंत्री होने का गौरव प्रदान किया। विरोधी पार्टियों ने मेरे खिलाफ षड़यंत्र रचे। मुझे हराने के लिए न जाने कितने हथकंडे अपनाये।
पर जीता कौन...? मैं, और हारे वो बहुरुपिए जो सालों से आपके बीच समाज-सेवा का नाटक कर रहे हैं। आपकी सहानुभूति हासिल करने के लिए आपके बीच शिक्षा का पाठ पढ़ा रहे हैं। डाॅक्टरी कैम्प लगाकर मुफ्त इलाज का ढिंढोरा पिट रहे हैं। मानवाधिकार के नाम पर आपका जन-समर्थन पाने की राजनीति कर रहे हैं। लेकिन जनता-जनार्दन जान गयी है कि उसका असली सेवक कौन है? प्रजापति होने का दर्जा किसे दिया जाना चाहिए।
आज के जमाने में कोई बेवकुफ भी नहीं चाहेगा कि शास्त्र और सिद्धांत बांच कर अपना उद्धार कर लें। दरअसल, परलोक सिधार जाएंगे पर चीजें टस से मस नहीं होंगी। साल-दर-साल आकाल पड़ेंगे, पर सुनवाई नहीं। बाढ़ आपका घर-बार चैपट कर देगा, पर काईवाई नहीं। आपके घर की इज्जत निलाम होगी, सफर सड़क पर नहीं गड्ढे में होगी, बीमारी जानबूझकर जानलेवा बन जाएगी, पर कोई रहनुमा नहीं आएगा आपका रोना-धोना और मातम-विलाप सुनने। उसके लिए चाहिए मर्द और पौरूष वाला व्यक्तित्व। ऐसा नेता जो धनबल और बाहुबल में पारंगत हो। जो आपके असमय दिवंगत होने पर आपके घरवालों का तत्काल मदद कर सके। आपकी सयानी बिटिया के हाथ पीले कर सके। आपके बिटवा को समुचित शिक्षा दिला सके। ऐसे समर्थं आदमी को केवल उसके पिछले कारनामों और कारगुजारियों को आधार बनाकर चुनावी दौड़ से बाहर नहीं किया जा सकता। सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहा जाता।
आदमी जन्म से अपराधी नहीं होता। क्रूर और हिंसक परिवेश बनाता है। आज उसी के बदौलत कमाये दौलत को मैं आपके बीच खुले दिल से देना चाहता हँू। आप संकोच नहीं करें। यह कोई आप पर अहसान नहीं है। यह मेरा फर्ज़ है जिसे मैं आपको अदा कर रहा हँू। आपका दिया यह पद-पदवी रहा तो देर होगा अंधेर नहीं। फिर से अशर्फिया जमा होंगी, आफरात दौलत का पिटारा होगा। विश्वास कीजिए मेरा। मैं आपके घर का बेटा हँू, आर्शीवाद के लिए इस मंच से आपको प्रणाम करता हँू।
आखिर में कहना चाहूंगा। मत भूलो आपलोग कि आज 26 जनवरी है। ऊपर वाले को धन्यवाद कि मुझे आपके बीच इस महान ध्वज को फहराने का सुअवसर मिला। खुश हँू मैं, आज अपना गणतंत्र 60 का हो गया। भारत की संसदीय नागरिकता मिली है, तो कुछ धर्म तो निभाने ही होते हैं-राष्ट्र के नाम पर। इस नाते आपके बीच खड़ा हो कर टूटी-फुटी भाषा में जो बोल सका, उसके असली हकदार आप ही हैं।
चारो तरफ एक स्वर में आवाज़ गूंजे-
दागी(?) है, तो अच्छा है,
गैया का असली बाच्छा है।

No comments: