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Friday, January 15, 2010

भैया! बना रहे बनारस हर दम

ऐसे समय में जब भारतीय संस्कृति पर सांस्कृतिक हमला जारी है. रहन-सहन से लेकर जीने का सलीका-तरीका तक बदलाव की चपेट में है. जिंदगी में आपाधापी, हो-हल्ला और चिल्ल-पों बढ़ी है. शब्द, संवेदना और सामाजिकता का दायरा घटा है. इन तमाम बुरे ख्यालातों और डरावने आशंकाओं के बीच भी प्राचीन स्मृतियाँ न तो विलुप्त हुई है और न ही बिखरी है. बनारसी परंपरा की कौन कहे, यह तो सदैव संबंधों को गर्माहट और गरिमा प्रदान करने का काम करता रहा है. लेकिन बनारस में रचने-बसने खातिर कुछ जरूरी शर्ते हैं. इसे बनारसी अदब में कुछ इस प्रकार कहा जाता है-‘राड़, साँढ़, सीढ़ी, सन्यासी; इन से बचै तो सेवै काशी’ एक और बात कही जाती है कि बनारस को पूर्णता में जानना मुश्किल है. यह हमेशा स्वयं को सौ-फीसदी प्रस्तुत करने से बचता है. यों तो कला, साहित्य, सिनेमा के अलावा नवसंचार माध्यम अपने-अपने हिसाब तथा दृष्टिकोण से इस ऐतिहासिक शहर का मुआयना करते आये हैं. परंतु अद्भुत और रहस्यमयी बनारस आज भी उनके लिए अजनबी और उतना ही अपरिचित बना हुआ है. कवि केदारनाथ सिंह ने बनारस की इस बनावट-बुनावट को ‘बनारस’ शीर्षक कविता में सधे अंदाज में चित्रित किया है-
‘अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है’
अगर हम इस शहर की प्राचीनता को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में खंगाले तो बनारस से वर्तमान वाराणसी में रूपांतरण शनैः-शनैः हुआ है. वैदिक काल में जहाँ यह जीवन-मृत्यु एवं मोक्ष-मुक्ति का पावन केन्द्र था. वहीं जैन-बौद्ध संप्रदायों के लिए ज्ञानाश्रयी स्थल था. आज सारनाथ की ख्याति इन्हीं कारणों से है, क्योंकि महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम अपने शिष्यों को उपदेश इसी जगह दिया था, जिसे बौद्ध ग्रंथों में ‘धर्मचक्रपरिवर्तन’ के नाम से जाना जाता है. हिन्दु धर्मावलम्बियों की दिव्यस्थली कहे जाने वाले बाबा विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा मंदिर, संकटमोचन मंदिर तथा कालभैरव मंदिर प्राचीनकाल से ही धार्मिक-संकेन्द्रण के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे हैं. कबीर और रैदास, जो भक्ति-आंदोलन के आधार-स्तंभ माने जाते हैं. उनका जन्मस्थली और तपोभूमि यही शहर है. राजशाही और व्यवस्थित राजतंत्र के हिसाब से काशी-नरेश का ओहदा सर्वोपरि था. मशहूर रामनगर का किला आज भी वास्तु और स्थापत्य के विचार से महत्वपूर्ण भारतीय विरासत हैं. जहाँ भ्रमणशील पर्यटकों की दिनभर आवाजाही लगी रहती है. लोक-कला और लोक-चेतना की दृष्टि से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित रविशंकर, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, किशन महराज जैसे जादुई शख्सियतों की सरजमीं बनारस आज भी शास्त्रीय संगीत और गायन विधा में अव्वल है. अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त इन प्रसिद्ध लोगों की सहज जीवनशैली और मृदुभाषिता आमजन को बेहद प्रभावित करती है. इसके अलावे यह जिक्र जरूरी है कि वैचारिक संजीवनी का प्रस्फुट्टन और साहित्य एवं हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव-विकास काशी से ही हुआ है. जिसे कबीर, तुलसी, रैदास, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, महामना मदन मोहन मालवीय, रामचन्द्र शुक्ल ने समकालीन हिसाब से गढ़ा. अब यह दारोमदार नई पीढ़ी के नायकों मसलन चंद्रबली सिंह, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह और ज्ञानेन्द्रपति पर है, जो अंधाधुंध बदलाव के चपेट और चंगुल में कैद वर्तमान मानव-समुदाय को वैचारिक खुराक प्रदान करने हेतु तत्पर हैं.
सिनेमा से आमआदमी का साबका हर रोज पड़ता है. क्योंकि यह समय, समाज और संस्कृति का प्रतिबिम्ब है. बनारस इसके दायरे से भला कैसे दूर रहता. अतएव, फिल्मों की दुनिया में अमिताभ ने बनारस को ज्यादा लोकप्रियता दिलायी. मसलन, ‘ओ...खइके पान बनारस वाला...कि खुल जाए बंद अक्ल का ताला.’ दरअसल, सिनेमा के रूपहले परदे पर बनारस को लेकर बहुत सारी फिल्में बनी हैं या फिर अपरोक्ष ढंग से उनमें इस शहर का जिक्र मिलता है. बनारस के ठेठपन और भदेसपन को बड़े ही सूक्ष्मता और सहजता के साथ सिनेमा में फिल्माया जाता रहा है. नामों की फेहरिस्त में पकंज पराषर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘बनारस-अ माइस्टिक लव स्टोरी’ के अतिरिक्त ‘लगा चुनरी में दाग’, ‘धर्म’, ‘चोखेर बाली’ शुमार है. विवाद और विरोध की वजह से दीपा मेहता ‘वाटर’ फिल्म भले यहाँ न बना पायी हों, पर वह बनारस केन्द्रित एक महत्वपूर्ण फिल्म है. अमूमन बनारस पर फिल्म बनाना आसान काम नहीं है. क्योंकि यहाँ बिम्बों की भरमार है. एंग्ल और लोकेशन के अनगिनत स्पाॅट हैं. अब निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर पर निर्भर है कि वह अपने विजुअल्स में क्या दिखाना चाहता है और क्या छोड़ना?