यह दुखद घड़ी ऐसे समय में नमुदार हुआ है, जब पश्चिम बंगाल में सत्तासीन सरकार के बुरे दिन चल रहे हैं। वामपंथ अपनी नाकामी और बुजदिली का झोला लिए फिर रहा है। माक्र्सवाद और साम्यवाद के नाम पर फिकरे कसे जा रहे हैं या उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं। कद्दावर नेता ज्योति बसु ने आँखें मूंद ली। पिछले हफ्ते निमोनिया की शिकायत पर कोलकाता के एमआरआई अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया था, जहाँ स्थिति नाजुक थी। शरीर के अंदरूनी अंग शिथिल पड़ रहे थे। डाॅक्टरों ने उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफलता न मिल पाई। अपने आदर्श-मूल्यों का आजीवन निर्वहन करने वाले इस वयोवृद्ध नेता ने रविवार की सुबह 11 बजकर 47 मिनट पर अतिम संास ली।
95 वर्षीय ज्योति बसु इस प्रदेश के लिए मेरुदंड समान रहे हैं। गरीब-गुरबों के लिए वो मसीहा थे। भूमि-सुधार कार्यक्रमों से पश्चिम बंगाल के किसानों का उन्होंने जो हित किया, वह बेमिसाल है। यह देश का ऐसा पहला प्रांत है, जहाँ फसल कटकर पहले बटाईंदार के घर जाती थी। इससे बिचैलियों का मकड़जाल और उनकी भूमिका ख़त्म हो गई। ज्योति बसु सरकार ने भूमि सुधार के तहत सरकार और जमींदारों के कब्जे की ज़मीनों को तकरीबन 10 लाख भूमिहीन किसानों को बांट दी। ऐसा कर दिखाना अन्य राज्यों के लिए दूर की कौड़ी है। पश्चिम बंबाल की जनता ने इस नेकी का फ़र्ज अदा किया। ज्योति बसु लगातार 23 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की राजनीति का अगुवा बने रहे। 1977 में पहली बार सत्ता का बागडोर थामने वाले इस चमत्कारी नेता को बाद के 23 वर्षों तक कोई चुनौती न दे सका। स्वास्थ्य कारणों से वर्ष 2000 में उन्होंने यह जिम्मेदारी बुद्धदेव भट्ाचार्य को सौंप दी।
ज्योति बसु पक्के कैडर थे, लेकिन उन्हें विदेशी निवेश और बाज़ारोन्मुखी दबाव का भान था। देश के अंदर तीव्र गति से हो रहे पूँजीगत बदलाव को देखते हुए उन्होंने इस ओर जानबूझकर रूख किया। लेकिन मज़दूर यूनियनों के विरोध ने उनकी सोच को कभी सच नहीं होने दिया। बावजूद इसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु कैबिनेट की अंतिम बैठकों तक अपनी बात को पूरी ताकत के साथ रखते थे। वह कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश की तरह ही अपने प्रदेश में संचार तकनीक और सूचना प्रौद्योगिकी विकसीत करने का इच्छुक थे। हाल के दिनों में पार्टी के कारनामों से वह क्षुब्ध और अप्रसन्न दिख रहे थे। पार्टी के गिरते साख और कैडरों की निष्ठा और बर्ताव में आ रहे गिरावट से ज्योति बसु को लगने लगा था,‘वामपंथ का अंतकाल सन्निकट है।’
ज्योति बसु ने कभी अपनी लोकप्रियता और राजनीतिक प्रतिष्ठा को नहीं भुनाया। उनके लिए पार्टी कमान का फैसला सर्वमान्य था। 1996 में केन्द्र में संयुक्त मोर्चा का गठबंधन सरकार जब बना, तो बसु को प्रधानमंत्री बनाने पर आम-सहमति बनी। पार्टी ने इस पर मुहर नहीं लगायी, जिस वजह से ज्योति बसु प्रधानमंत्री के पद पर आसिन होने से वंचित रह गए। वह भी वैसे समय में जब क्षेत्रिय राजनीति में ज्योति बसु के टक्कर का कोई प्रभावशाली व्यक्तित्व नहीं था। काफी बाद में बसु ने खुद भी इस निर्णय को ‘ऐतिहासिक भूल’ कहा। लेकिन उस समय ज्योति बसु ने न तो मुखालफत की और न ही दल-बदल की धमकी दी। यह सच्चा आदर्श आज के राजनीतिक परिवेश में ‘मृग मरीचिका’ ही है। अपने स्वार्थ के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाने वाले राजनीतिज्ञों को इससे सीख लेनी चाहिए। आज वामपंथ जिस धुरी पर नाच रहा है, उसमें नानाप्रकार के पेंच हैं। अब लोगों को वामपंथ से मोहभंग होने लगा है। क्रांति और आंदोलन के बूते सत्ता-परिवर्तन का सपना देखने वाली वामपंथ स्वयं अपने आदर्शों से विचलित है। उसकी चूले हिल रही हैं और उम्मीद बेमानी ही कही जाएगी कि सन्निकट भविष्य में वामपंथ का पूरे देश में राज होगा। हाल के कारगुजारियों से प्श्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी के भविष्य पर भी खतरा मंडराने लगा है। भद्रजनों का समाज उनके खिलाफ है। राष्ट्रीय बुद्धिजीवियों ने विरोध का मोर्चा खोल रखा है सो अलग।
दरअसल, पार्टी की नीतियों का जिस तरह से आलोचना और छिछालेदर जारी है, वह कहीं न कहीं ज्योति बसु के पारंगत राजनीतिक अनुभव और विवेकपूर्ण निर्णयों का हालिया समय में आभाव दर्शाता है। हमें ऐसे नेता के चले जाने का गम तो हैं ही, सबसे ज्यादा डर वाम पार्टी के अंधे होने का है। गूंगा-बहरा तो वो काफी पहले ही हो चुकी है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक और दैनिक समाचारपत्र ‘टेलीग्राफ’ के राजनीतिक संपादक आशीष चक्रवती का यह कहना निराधार नहीं है कि ‘बसु कम्युनिस्ट कम व्यावहारिक अधिक दिखते थे, एक सामाजिक प्रजातांत्रिक। लेकिन उनकी सफलता यह संकेत देती है कि सामाजिक लोकतंत्र का तो भविष्य है लेकिन साम्यवाद का अब और नहीं।’
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Sunday, January 17, 2010
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