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Friday, January 15, 2010

बदले-बदले ये नज़ारे हैं...,

लच्छेदार शब्दों में शुरुआत करें, तो कहा जा सकता है कि आज आज़ादी का मतलब कोकाकोला की तरह टेस्टी पेय हो गया है। उत्सव और उल्लास के उजास में लिपटा एक ऐसा तोहफ़ा, जिसको पाने के लिए आज की पीढ़ी को कुछ ख़ास करतब नहीं करना पड़ा। कारागार और काला-पानी का संत्रास नहीं झेलना पडा़। और न ही अपना सर्वस्व राष्ट्रहित में आहूत कर देने की नौबत आई। ऐसे में अगर युवा पीढ़ी ‘मस्ती की पाठशाला’ और ‘पप्पू काॅण्ट डांस स्साला...,’ का ‘टन...टना...’ राग अलापने में मशग़ूल है, तो इसमें उसकी क्या गलती? उपलब्ध चीज़ों का उपयोग आज की उपभोक्ता संस्कृति की पहली शर्त है, चाहे देश की अधिकांश जनता भूखी-नंगी और रोगग्रस्त ही क्यों न हो?
असल में युवा पीढ़ी के ऊपर आक्षेप लगाना आसान है, लेकिन इन सवालों से जूझना बेहद मुश्क़िल। आज हमारे शीर्ष पंक्ति के हुक्मरानों का जो चारित्रिक गठन है, उसमें अनगिनत सुराख़ हैं। हमारे अभिभावकों के अंदर भी मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति तिरस्कार की भावना घर करती जा रही है। ऐसे में युवा पीढ़ी से उच्च मानदंडों की अपेक्षा करना बेमानी है। उचित और जिम्मेदार संस्कारों के अभाव में आज की उत्तर पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति सकारात्मक सोच और चिंतन की रहितता और समृद्ध हुई है।
असल में शब्दों से सिर्फ कागज काले किए जा सकते हैं, उनसे आवाज़ नहीं निकाली जा सकती। आज हमारे खुद के तंत्र में अनेक ख़ामियाँ हैं। हर शाख़ पर उल्लू बैठा है। लोगबाग त्रस्त और परेशान हैं। उम्मीद की किरण कहे जाने वाले युवा जमात में अधिकांश के पास सक्षम बुद्धि-विवेक नहीं है। और जिनके पास है, उन्हें फैशन, ट्रीट, पार्टी और वेलेंटाइन डे मनाने से फुरसत नहीं है। कुछेक दिलेर युवा, समाज और सत्ता-परिवर्तन का स्वप्न भी देखते हैं, तो सहारे की दीवार अंदर से खोखली और झूठ-मक्कारी के रवे से सनी हुई मिलती है। इन दिनों क्षितिज में एक नया महानायक जन्मा है-बराक ओबामा। अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में इनसे ढेर सारी आशाएँ हैं, पर भारतीय युवाओं को इनके नज़रिए से खुद को आँकना बेवक़ूफ़ी ही कही जाएगी। भारतीय परिदृश्य में बदलाव के लिए भारतीय सरज़मीं से निकले नायक की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि भारत में क्षमतावान युवा नहीं हैं, प्रतिस्पर्धा में अव्वल साबित होने वाले बाज़गीर ज़ांबाज़ नहीं हैं। आप खुद देखें, आज काॅरपोरेट सेक्टर से लेकर मून-मिशन तक नई पीढ़ी की धमक ज़बर्दस्त है। बस उनकी कमी मुख्यधारा की राजनीति और नौकरशाही परंपरा में खल रही है। अभी तक युवाओं के शौर्य, साहस, विवेक और चेतना को गलत तरीके से आजमाया गया है। उनकी सोच और स्वप्न को छला गया है। आज यदि भारत की अधिसंख्य जनता कंगाल है, तो इसकी मुख्य वजह हमारी खुद की बनाई नीतियाँ हैं। लेकिन यह रोना-धोना अब किस काम का? सत्ता और सरकार अब अपनी है। जनता के हुक्म पर सड़क से संसद तक का सफर पूरा होता है। फिर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में घोर हताशा और निराशा का क्या औचित्य?
साथियों, मैं जानता हँू कि आज गणतंत्र दिवस के मौके पर अख़बार, रेडियो और टेलीविजन अपने चिर-परिचित अंदाज़ में राष्ट्रघोष करते मिलेंगे या फिर आज़ाद भारत की वर्तमान दुर्दशा पर चीखते-चिल्लाते। लेकिन ये भी किसी ‘रियलिटी शो’ के प्रायोजित नौटंकी से भिन्न नहीं है। हम खुद से तो अपनी नीति-रणनीति तय कर ही सकते हैं। मंज़िल पाने की हजारों ख़्वाहिशें हैं, पर मुकम्मल रास्ता कौन सा चुनें, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। हिन्दुस्तानी होने का अर्थ सिर्फ़ भारत में रहना भर नहीं होता। यहाँ की हरेक चीज़ से अपनापन महसूस करना, उनके लिए खुद के अंदर जगह होना, चाहे वह मानसिक और वैचारिक ही क्यों न हो। आज के युवाओं की गलत संगत और अपराध में बढ़ती संलिप्तता मन में क्षोभ पैदा करती है, पर बदलाव की गुंजाइश के लिए इन्हीं बाजुओं पर नजरें टिकाना हमारी जरूरत है। क्योंकि जो आज गलत कर रहे हैं, वो नादान हैं। जिस दिन ये समझदार हो गए, भारत का कायाकल्प हो जाएगा...निश्चय ही।